मर्यादा बनी रहे, तभी संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान

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पल्स- अजय शुक्ल 

लोकतंत्र का आदर्श “सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय” होता है। इस उद्देश्य की पूर्ति होने पर ही एक मजबूत लोकतंत्र बनता है। ऐसी संस्थाओं की स्वायत्तता से अगर खेला गया तो निश्चित रूप से लोकतंत्र गंभीर संकट में फंस जाएगा। देश संक्रमण काल से गुजर रहा है। मौजूदा हालात में हमें काफी संजीदा और सहज होना पड़ेगा, जो नहीं हो रहा है। नरेंद्र मोदी को देश के नागरिकों ने सकारात्मक बदलाव के लिए भरपूर जनादेश दिया था, जिससे वह मानवतावादी राष्ट्र का निर्माण कर सकें।

उस दिशा में कुछ कदम उठे मगर फिर अराजकता को बढ़ावा दिया जाने लगा। दुख है कि इस वक्त संवैधानिक संस्थाओं को जिस तरह से मुट्ठी में भींचा जा रहा है और देश मे जो हो रहा है, वह राष्ट्र के भविष्य को कलंकित करने वाला है। सरकार के साथ ही संवैधानिक संस्थाओं के प्रमुखों की भी नैतिक जिम्मेदारी है कि वे दबाव रहित रहें, नहीं तो वह समय दूर नहीं जब उन्हें सम्मान के स्थान पर गालियां मिलेंगी और वे खुद पीड़ित नजर आएंगे।

बीते दिनों जिस तरह से भारतीय रिजर्व बैंक की स्वायत्तता पर सरकार ने मनमानी की, वह चिंता का विषय है। रिजर्व बैंक पर उसकी संरक्षित निधि को डिफाल्टर्स उद्योगपतियों को देने का दबाव डाला गया। भारतीय रिजर्व बैंक के पास कुल 9.65 लाख करोड़ रुपये संरक्षित निधि में हैं। डिफाल्टर्स उद्योगपतियों का कर्ज 10.35 लाख करोड़ रुपये है, जो डेड मनी हो चुका है। यह रकम 2014 में करीब तीन लाख करोड़ रुपये थी।

दबाव का ही असर था कि पूर्व गवर्नर रघुरमन राजन और सरकार के बीच मतभेद हुए और फिर उर्जित पटेल से भी। अंततः पटेल ने अपनी नियुक्ति अवधि पूर्ण होने से पहले ही इस्तीफा दे दिया। सरकार ने उनके स्थान पर किसी सुयोग्य वित्त विशेषज्ञ को नियुक्त करने के बजाय रीढ़विहीन समझे जाने वाले ब्यूरोक्रेट को तैनात कर दिया, जो अर्थशास्त्री नहीं बल्कि इतिहासकार है। यह नियुक्ति निश्चित रूप से देश के दीवालियापन का प्रतीक है। सवाल यह है कि क्या 130 करोड़ की आबादी में एक भी सुयोग्य अर्थशास्त्री नहीं है?

कमोबेश, यही हाल न्यायपालिका का है। उच्च न्यायपालिका में 384 जजों के पद रिक्त पड़े हैं। निम्न अदालतों के न्यायाधीशों के करीब पांच हजार पद रिक्त हैं। इन खाली पदों को तेजी से भरने के लिए कोई कारगर प्रयास नहीं किया जा रहा। अदालतों में करीब साढ़े तीन करोड़ मुकदमें लंबित हैं। इनके लंबित होने से पीड़ित को न्याय नहीं उत्पीड़न अधिक मिल रहा है। न्यायपालिका में बैठे जिम्मेदार जज इस दिशा में संजीदा होने के बजाय अपने निजी सुख-सुविधाओं को लेकर ज्यादा चिंतित नजर आते हैं।

यही वजह है कि वे न्यायपालिका के सम्मान को गिरवी रखकर सरकार के आगे नतमस्तक होते हैं। यह उसी भारत की न्यायपालिका है जिसने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ सख्त फैसला सुनाया था। इस वक्त हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के कई ऐसे निर्णय आये हैं, जो उसकी गरिमा को गिराने वाले प्रतीत होते हैं।

संवैधानिक संस्थाओं के प्रमुख सरकार के आगे हुक्म बजाते दिखते हैं। सरकार का दबाव और उस दबाव के आगे झुकने से इन संस्थाओं का सम्मान खत्म हो रहा है। अब वक्त लुका छिपा का नहीं है। मीडिया और सोशल मीडिया तथ्यों के साथ सच को उजागर कर आपको कटघरे में खड़ा कर देता है।

चुनाव आयोग हो या फिर सूचना आयोग, इन्हें संवैधानिक स्वायत्तता इसलिए दी गई थी कि वे ईमानदारी से लोकतंत्र और लोकहित को ध्यान में रखकर फैसले दें। कुछ सालों में यह देखने क मिल रहा है कि दोनों ही संस्थायें सरकार से पूछकर फैसले सुना रही हैं। हाल के कुछ चुनावों में देखने को आया कि सत्तारूढ़ पार्टी के जिम्मेदार लोगों ने चुनाव की जो तिथियां घोषित कीं बाद में चुनाव आयोग ने वही तय कर दिया।

इसी तरह सूचना आयोगों ने सार्वजनिक सूचना देने के पहले सरकार से ही पूछा कि क्या वे उपरोक्त सूचना दे दें। हमें अपने बचपन की एक घटना याद आती है “मेरे पिताजी, कई बार मेरे छोटे भाई पर व्यंग करते हुए कहते कि बाथरूम जा रहे हो, मम्मी से पूछ लिया है? “उनका यह व्यंग इसलिए होता था क्योंकि भाई हर बात मां से पूछकर ही करता था। यही हाल हमारी तमाम संवैधानिक संस्थाओं का होता दिख रहा है।

सामान्य तौर पर सेना का देश के नागरिकों में बहुत सम्मान है। यह सम्मान उनके योगदान के कारण है। इससे सेना को भी यह नहीं समझना चाहिए कि उससे सवाल नहीं किये जाएंगे। जब सवाल होते हैं,तो संतुलन बना रहता है। बीते कुछ सालों में सेना और सेनाधिकारियों का इस्तेमाल सियासी फायदे के लिए होने लगा है। जिस जवाबदारी के लिए सरकार चुनी जाती है, वे जवाब सरकार के चुने प्रतिनिधियों के बजाय सेना के अधिकारियों से दिलवाये रहे हैं।

सेना के इस सियासीकरण से नागरिकों में उसका सम्मान गिर रहा है। हालात यह हैं कि अब सेनाध्यक्ष को सियासी प्रवक्ता के तौर पर देखा जाने लगा है। विश्व में कहीं भी ऐसा नहीं होता। सेनाध्यक्षों के बयान किसी उपलब्धि के अवसर पर ही आते थे। सियासी आरोपों-प्रत्यारोपों पर उनका कभी इस्तेमाल करने की परंपरा नहीं रही, जबकि भारत ने 1971 में विश्व की सबसे बड़ी जीत भी अर्जित की थी।

सरकार का काम है कि वह अपने देश के नागरिकों की समस्याओं का समय पर समुचित समाधान करे। उनके बेहतर और शांतिपूर्ण जीवन में सहायक हो। नागरिकों पर टैक्स का बोझ कम हो। सरकारी खर्चों में कटौती करके उसे आय-व्यय को व्यवस्थित किया जाये। युवाओं और अनुभवधारियों को योग्यतानुकूल रोजगार मिले जिससे उनकी योग्यता अराजकता में न बदले।

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में कहा था कि “न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन” की नीति पर राष्ट्र को आगे बढ़ाया जाएगा, मगर दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि हुआ इसके उलट है। जनता पर लगाम कसने के लिए सरकारी तंत्र लगा दिया गया है। सुशासन के नाम पर देश को कुछ हासिल नहीं हुआ। सवाल उठाने वाली संवैधानिक संस्थाओं पर लगाम डाल दी गई है।

मौजूदा सरकार के पास करने के लिए अब सिर्फ साढ़े तीन माह बचा है मगर उसकी शैली में बदलाव नहीं हो रहा। सवाल उठाने पर उलट सवाल मिलता है कि पिछली सरकारों में क्या ऐसा नहीं होता था। जनाब,पिछली सरकारों ने अच्छा नहीं किया था, तभी तो आपको लाये थे। आपने कुछ सुधारा नहीं मगर उन्होंने अपनी गलतियों को महसूस कर सुधार करना शुरू कर दिया है। वक्त कम है, अगर अभी भी सकारात्मक सुधार नहीं किया तो आपका सम्मान भी जाता रहेगा। लोकतंत्र में जनता जनार्दन होती है।

(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

ajay.shukla@itvnetwork.com  

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