चंडीगढ़ की ट्रेड यूनियनें गठबंधन बना यूटी प्रशासन की निकालेंगी हेकड़ी

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प्रस्तुति संजीव शर्मा
चंडीगढ़ 23 नवंबर 2019। देश में गठबंधनों से बनने वाली सरकारों से शहर की ट्रेड यूनियनों ने सीख लेते हुए महागठबंधन बनाकर कर्मचारियों की लड़ाइयां लड़ने के लिए गंभीरता से विचार शुरू कर दिया है। इसको लेकर विभिन्न संगठनों आपस में कॉमन मिनिमम प्रोग्राम बनाकर स्थानीय प्रशासन और सरकार से टकराने का मन बना दिया है। ट्रेड यूनियनों का मानना है कि अब तक राजनेताओं ने वोट लेने के लिए दिन का सपना दिखाकर उन्हें सिर्फ और सिर्फ ठगने का काम किया है। इसलिए अब समय आ गया है कि ट्रेड यूनियनों महागठबंधन बनाकर निजी स्वार्थ से उपर उठकर दो-दो हाथ करने का समय आ गया है। 
धड़ों में बंटने से ताकत कम 
शहर की अलग ट्रेड यूनियनें पिछले कई सालों से विभिन्न मांगों को लेकर लड़ाइयां लड़ते आ रहे हैं। यूटी कर्मचारियों के धड़ों में बंट जाने के कारण उनकी ताकत कम हो गई है। इस प्रकार पिछले कई सालों एक दर्जन प्रमुख मांगें लंबित पड़ी हुई हैं। चौंकाने वाली बात है कि अब जितने भी राजनेता आए उसमें अधिकतर नेताओं ने वोट की राजनीति करते हुए एमपी और केंद्र में मंत्री बन गए, लेकिन उनकी मांगें पूरी नहीं हुई। कर्मचारियों की ऐसी मांगें हैं जिनपर कर्मचारियों को लड़ाई लड़नी पड़ रही है, लेकिन कोई रिजल्ट सामने नहीं आया है। इसमें प्रमुख मांगे जैसे कर्मचारियों की वेतन विसंगित दूर करने, मृतक कर्मचारियों के आश्रितों को 5 प्रतिशत सीलिंग खत्म कर पंजाब के आधार पर नौकरी देने, करीब 18 हजार कच्चे कर्मचारियों को पक्के करने, खाली पदों को भरने, यूटी कर्मचारियों को मकान देने जैसे कई अन्य मांगें लाख लड़ाई के बाद भी पूरा नहीं हुआ है। इसलिए सभी ट्रेड यूनियनों ने महागठबंधन के आधार पर एकजुट होने के लिए काम शुरू कर दिया है।
 
रंजीत सिंह हंस
यूटी सबआॅर्डिनेट सर्विसेस फेडरेशन चंडीगढ़ के प्रधान रंजीत हंस का कहना है कि कर्मचारियों की मांगें राजनेताओं के गले में माला डालकर या उन्हें गुलदस्ता देकर पूरी नहीं हो सकती है। इसके लिए कर्मचारियों को एक जुट होकर खुद ही लड़ाई लड़नी पड़ेगी। उन्होंने कहा कि करीब 700 कर्मचारियों की ड्यूटी पर ही मौत हो गई। इसके बाद भी किसी एक की भी नौकरी नहीं हुई है, जबकि पंजाब में ऐसे लोगों के आश्रितों को नौकरी दी गई है, लेकिन चंडीगढ़ प्रशासन और यहां के नेता कुछ नहीं कर रहे हैं। उनके अनुसार इस तरह की कई मांगें हैं, जिनपर ट्रेड यूनियनों की सहमति हो सकती है। हंस का दावा है कि ट्रेड यूनियनों का महागठबंधन बनाने को लेकर आपसी चर्चा हो रही है। बहुत जल्द इसे सिरे चढ़ाया जाएगा। साथ ही कर्मचारियों की मांगों को लेकर लड़ाइयां लड़ी जाएंगी।
 
अश्विनी शर्मा
इंटक महासचिव अश्विनी शर्मा का कहना है कि जब महागठबंधन कर सरकारें बन सकती है तो कर्मचारियों के हितों की लड़ाई आपस में महागठबंधन कर क्यों नहीं लड़ी जा सकती है। उन्होंने जोर देकर कहा अब समय आ गया है कि सालों साल से लंबित मांगों मनवाने के लिए अपनी लड़ाई पूरी ताकत से लड़ने के लिए महागठबंधन तैयार हो। इसके लिए कॉमन मिनिमम प्रोग्राम तैयार किया जाए। इंटक में करीब एक दर्जन से अधिक छोटी बड़ी यूनियनें हैं।
गोपाल दत्त जोशी
यूटी इम्प्लाइज एंड वर्कर्स चंडीगढ़ के महासचिव गोपाल दत्त जोशी का कहना है कि सभी लड़ने और खड़ने वाली ट्रेड यूनियनों को एक साथ आकर लड़ाई लड़नी पड़ेगी। उन्होंने कर्मचारी नेताओं को अगाह करते हुए कहा कि राजनेता कर्मचारियों की हितों के लिए नहीं बल्कि अपने हितों के लिए कर्मचारियों की ताकत का उपयोग करते हैं। जोशी ने कहा कि अब भी समय है कि कॉमन मिनिमम प्रोग्राम बनाकर निजी स्वार्थों को छोड़कर लड़ाई शुरू करें। इसमें करीब 18 यूनियनें अंगीकृत है।
डा. धर्मेंद्र
यूटी इंप्लाइज हाउसिंग वेलफेयर सोसायटी के महासचिव डा. धर्मेंद्र ने कहा कि कर्मचारियों में एका नहीं होने के कारण ही सेल्फ स्कीम के तहत फ्लैट्स नहीं मिले। उनका मानना है कि यदि सभी कर्मचारी एकजुट होकर लड़ाई लड़ते तो सभी आठ हजार कर्मचारियों को आज मकान मिल जाता। क्योंकि कर्मचारियों की कमजोरी के कारण ही सक्सेस और अनसक्सेस की बात आई थी। अभी भी समय है कि कर्मचारियों के अन्य मांगों को मनवानने के लिए सर्व कर्मचारी संघ या महागठबंधन बनाकर अपने हितों की लड़ाइयां लड़ी जाए। ऐसे में यूटी में 30 हजार से अधिक हर प्रकार के कर्मचारियों का भला होगा। डा. धर्मेंन्द्र का कहना है कि महागठबंधन को ट्रेड यूनियनों से बात चल रही है।
माध्यम आईटीवी नेटवर्क 

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