पुरानी बात पर अचानक विवाद, कांग्रेस की देरी और भाजपा नेताओं की चुप्पी—निशाना सिर्फ प्रदेश अध्यक्ष पर!
कुमार मधुकर
चंडीगढ़. भाजपा की मौजूदा सियासत में प्रदेश अध्यक्ष जतिंदर पाल मल्होत्रा पूरी तरह केंद्र में आ गए हैं। हालिया विवाद ने यह संकेत और मजबूत कर दिया है कि इस पूरे घटनाक्रम में सीधा और एकमात्र निशाना भाजपा प्रदेश अध्यक्ष जतिंदर पाल मलहोत्रा की लगातार बढ़ती लोकप्रियता है। भाजपा के अंदर कई ऐसे नेता हैं जो अपने को तीसमार खां समझने की भूल करते हुए मल्होत्रा को एन—केन—प्रकारेण बदनाम करने की कोशिश करने में लगातार जुटे हुए हैं। इसी का नतीजा है कि जिस वीडियो को लेकर बवाल खड़ा हुआ, वह महीने पुराना बताया जा रहा है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि अगर बयान उस समय दिया गया था, तो कांग्रेस की प्रतिक्रिया उसी वक्त क्यों नहीं आई? अचानक ही कांग्रेसियों को सपना क्यों आने लगा है। इसलिए अचानक इसे मुद्दा बनाना राजनीतिक टाइमिंग, पर सवाल खड़े करता है।
यही नहीं, इस देरी ने एक और संकेत दिया है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पंजाब दौरे से ठीक पहले इस मुद्दे को उछालना यह साफ दर्शाता है कि इस मौके का इंतजार सिर्फ कांग्रेस ही नहीं, बल्कि मल्होत्रा के धुर विरोधियों को भी था। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि अंदरूनी असंतोष और बाहरी विरोध एक ही बिंदु पर आकर मिल गए हैं। पार्टी के भीतर चल रही खींचतान की झलक इस बात से भी मिलती है कि पूरे विवाद के दौरान भाजपा का कोई बड़ा नेता खुलकर प्रदेश अध्यक्ष जतिंदर पाल मल्होत्रा के बचाव में सामने नहीं आया। यह सन्नाटा अपने आप में कई सवाल खड़े करता है और अंदरूनी समीकरणों की ओर इशारा करता है।
वहीं, दूसरी ओर मल्होत्रा की बढ़ती लोकप्रियता को भी इस पूरे घटनाक्रम की बड़ी वजह माना जा रहा है। उनके नेतृत्व में हुए कार्यक्रम—खासतौर पर “खेलो चंडीगढ़”—की सफलता ने उन्हें एक मजबूत और सक्रिय नेता के रूप में स्थापित किया है, जिसकी गूंज चंडीगढ़ के अलावा हिमाचल, हरियाणा, पंजाब के अन्य राज्यों में भी सुनाई दे रही है।
हालांकि विवाद बढ़ने पर जतिंदर पाल मल्होत्रा ने तुरंत माफी मांग कर स्थिति को शांत करने की कोशिश की। उनके इस कदम को राजनीतिक परिपक्वता और जिम्मेदारी के रूप में देखा जा रहा है, जिससे मामला और ज्यादा नहीं बढ़ा। कुल मिलाकर एक महीने पुरानी बात को अचानक उछालना, सही समय का इंतजार, और फिर पार्टी के भीतर से समर्थन का अभाव—ये सभी संकेत इस ओर इशारा करते हैं कि सियासी निशाना पहले से तय था। अब यह देखना अहम होगा कि भाजपा इस अंदरूनी चुनौती को कैसे संभालती है और क्या संगठनात्मक एकजुटता कायम रख पाती है।























